पश्चिमी दिल्ली के उपभोक्ता आयोग ने 21 अक्टूबर 2026 को Bank of Baroda से जुड़े पुराने विवाद में ₹38,649 लौटाने और ₹15,000 मुआवजा देने का कथित आदेश दिया। खबर के मुताबिक बैंक ग्राहक की जिम्मेदारी साबित नहीं कर पाया। मूल आदेश स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं हुआ।
पश्चिमी दिल्ली के उपभोक्ता आयोग का आदेश क्या था?
पश्चिमी दिल्ली के जिला उपभोक्ता आयोग ने 21 अक्टूबर 2026 के फैसले में कथित तौर पर Bank of Baroda को ₹38,649 लौटाने और ₹15,000 मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह विवाद जुलाई 2019 में ग्राहक के खाते से हुए चार इलेक्ट्रॉनिक डेबिट से जुड़ा है। खबर के मुताबिक बैंक यह साबित नहीं कर सका कि ग्राहक जिम्मेदार था, और जांच का पर्याप्त रिकॉर्ड भी नहीं दिखा सका। इसलिए यह मामला ब्रांच अधिकारियों, फ्रॉड टीम और शिकायत निपटाने वाले स्टाफ के लिए महत्वपूर्ण है।
आयोग का पूरा प्रमाणित मूल आदेश स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं हुआ। सुनवाई और राहत का विवरण Times of India की देखी गई रिपोर्ट पर आधारित है। RBI का 6 जुलाई 2017 वाला मूल ग्राहक-सुरक्षा सर्कुलर अलग से पढ़ा गया, ताकि आधिकारिक नियम और खबर में बताए गए तथ्य स्पष्ट रूप से अलग रहें।
चार ट्रांजैक्शन और शिकायत
ग्राहक के अनुसार 15 जुलाई 2019 को बिना उसकी अनुमति के ₹9,999, ₹10,690, ₹11,680 और ₹6,280 निकाले गए। कुल रकम ₹38,649 थी। उसका दावा था कि OTP या अलर्ट नहीं मिला। खबर के अनुसार अगले दिन पुलिस में सूचना दी गई। विवाद न सुलझने पर सितंबर 2020 में उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई। ट्रांजैक्शन एक वॉलेट प्लेटफॉर्म से जुड़े थे, लेकिन इससे खुद-ब-खुद यह साबित नहीं होता कि किसने फ्रॉड किया।
आयोग ने किन बातों पर गौर किया?
रिपोर्ट के मुताबिक नोटिस मिलने के बावजूद बैंक सुनवाई में शामिल नहीं हुआ और अक्टूबर 2023 में एकतरफा कार्यवाही आगे बढ़ी। Paytm ने अपनी जिम्मेदारी से इनकार किया। आयोग ने कथित तौर पर पाया कि बैंक ने जांच के दस्तावेज और रकम पाने वाले खातों की जानकारी पेश नहीं की। ग्राहक की मंजूरी या लापरवाही भी साबित नहीं हुई। उपलब्ध तथ्यों पर आयोग ने बैंक की सेवा में कमी पाई और Paytm को जिम्मेदार नहीं ठहराया।
रिपोर्ट में आदेश की प्रति मिलने के 30 दिन के भीतर ₹38,649 रिफंड और ₹15,000 मुआवजा देने की बात है। आदेश जारी होने का मतलब यह नहीं कि बैंक ने रकम दे भी दी है। उपलब्ध स्रोतों से अपील, स्टे या भुगतान की पुष्टि नहीं मिली।
RBI के ग्राहक जिम्मेदारी नियम में क्या लिखा है?
RBI का 6 जुलाई 2017 का सर्कुलर निर्दिष्ट बैंकों, जिनमें अनुसूचित कमर्शियल बैंक और RRB शामिल हैं, के अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन से जुड़ा है। ग्राहक की जिम्मेदारी इस पर निर्भर करती है कि गलती बैंक की थी, तीसरे पक्ष की थी या ग्राहक की लापरवाही थी, और शिकायत कब दर्ज हुई। कुछ परिस्थितियों में जीरो जिम्मेदारी मिल सकती है। बैंक की वजह से हुई कमी और बैंक से संदेश मिलने के तीन कार्यदिवस के भीतर रिपोर्ट किए गए कुछ थर्ड-पार्टी ब्रीच ऐसे उदाहरण हैं। देरी से रिपोर्ट या गोपनीय भुगतान जानकारी साझा करने पर नियम अलग हैं।
RBI सर्कुलर ट्रांजैक्शन अलर्ट, 24×7 शिकायत चैनल, शिकायत की रसीद और आगे गलत डेबिट रोकने की कार्रवाई की बात करता है। अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन में ग्राहक की जिम्मेदारी साबित करने का भार बैंक पर है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर विवादित डेबिट में बिना तथ्य देखे अपने आप रिफंड मिलना ही है।
ब्रांच और फ्रॉड टीम के लिए जरूरी बातें
- पहली शिकायत ठीक से दर्ज करें: सूचना का समय, ट्रांजैक्शन नंबर, पेमेंट चैनल और शिकायत रेफरेंस सुरक्षित रखें।
- जांच के सबूत बचाएं: अलर्ट लॉग, प्रतिक्रिया का समय और अनुमत भुगतान विवरण का रिकॉर्ड रखें।
- जिम्मेदारी तथ्य देखकर तय करें: RBI निर्देश और बैंक की बोर्ड-अप्रूव्ड पॉलिसी लागू करें, बिना सबूत ग्राहक पर दोष न डालें।
- कानूनी नोटिस पर कार्रवाई करें: आयोग में बैंक का अधिकृत पक्ष और दस्तावेज समय से प्रस्तुत हों।
पुराना मामला और आज की स्थिति
विवादित ट्रांजैक्शन जुलाई 2019 के थे। आयोग का बताया गया फैसला 21 अक्टूबर 2026 का है और खबर 29 अक्टूबर 2026 की। यह 7 नवंबर का नया फ्रॉड नहीं है, बल्कि रिसर्च में सामने आया पुराना ग्राहक-सुरक्षा मामला है। पूरा आदेश और रकम चुकाने की बाद की स्थिति स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है।
स्रोत और संदर्भ
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