पटना हाई कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2026 के आदेश में State Bank of India के अधिकारियों के खिलाफ पूर्व पैनल वकील का ₹25 लाख का मानहानि दावा खारिज किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी वकील की पेशेवर नियुक्ति खत्म करना और उसके बारे में किसी तीसरे व्यक्ति को मानहानिकारक बात कहना अलग-अलग बातें हैं। बैंकों के लीगल पैनल मैनेजमेंट में यह फर्क अहम है।
पटना हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
27 अक्टूबर 2026 को पटना हाई कोर्ट के जस्टिस रमेश चंद्र मालवीय ने State Bank of India (SBI) के अधिकारियों की सिविल रिवीजन याचिका मंजूर की। जमुई की निचली अदालत ने पूर्व पैनल वकील का मानहानि मुकदमा शुरुआती स्तर पर खारिज करने से इनकार किया था। हाई कोर्ट ने वह आदेश पलटते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता के Order VII Rule 11(a) के तहत मुकदमे की plaint खारिज की। कोर्ट के मुताबिक संबंधित अधिकारियों के खिलाफ मानहानि के जरूरी तथ्य उसमें नहीं थे।
मामले का नाम Assistant General Manager, State Bank of India, Regional Office, Bhagalpur and Others v. Mantosh Prasad Sinha है। केस नंबर Civil Revision No. 186 of 2024 है। यह बाहरी पैनल वकील से जुड़ा खास सिविल विवाद है। इसे बैंक कर्मचारियों की सर्विस समाप्ति से जुड़ा सामान्य नियम नहीं समझना चाहिए।
विवाद की पृष्ठभूमि
कोर्ट के रिकॉर्ड और कानूनी रिपोर्ट के अनुसार, वकील लगभग 35 साल तक जमुई में SBI के पैनल से जुड़े थे। एक संपत्ति के टाइटल की जांच पर उनकी रिपोर्ट को दूसरे वकील ने दोबारा देखा। पहले वकील ने पैनल नियुक्ति खत्म होने और टाइटल रिपोर्ट से जुड़े विवाद के कारण प्रतिष्ठा और आय को नुकसान होने का दावा किया। उन्होंने 2020 में ₹25,00,000 का हर्जाना मांगा।
बैंक अधिकारियों ने आपत्ति उठाई। अक्टूबर 2024 में निचली अदालत ने plaint खारिज नहीं की थी। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा। निचली अदालत ने उस चरण पर आरोपों को सच साबित नहीं माना था; सवाल केवल मुकदमा आगे चलने का था।
पैनल से हटाना और मानहानि अलग कैसे?
हाई कोर्ट ने बताया कि किसी वकील के साथ पेशेवर काम जारी रखना या खत्म करना संस्थान का अलग निर्णय है। केवल पैनल से नाम हटने का यह अर्थ नहीं कि वकील के चरित्र या ईमानदारी के बारे में किसी तीसरे व्यक्ति को आरोप बताया गया। मानहानि के मुकदमे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-सी बात, किसने, किससे और कब कही या प्रकाशित की।
कोर्ट को इस plaint में उन जरूरी बातों का पर्याप्त विवरण नहीं मिला। पेशेवर काम या कमाई में नुकसान अपने आप किसी प्रकाशित मानहानिकारक बयान का प्रमाण नहीं बन जाता।
फैसले की सीमाएं
- अलग बयान पर अलग मामला: अगर कोई व्यक्ति स्वतंत्र रूप से किसी तीसरे व्यक्ति के सामने मानहानिकारक आरोप लगाता है, तो कानून के तहत अलग दावा संभव हो सकता है।
- संपत्ति के टाइटल पर फैसला नहीं: कोर्ट ने दस्तावेज या दोनों टाइटल रिपोर्टों की सही-गलत स्थिति तय नहीं की।
- दूसरी कार्यवाहियां: अलग से बताई गई आपराधिक कार्यवाहियों के गुण-दोष पर फैसला नहीं हुआ।
- बैंक स्टाफ की सेवा शर्तें: यह कर्मचारियों के ट्रांसफर, नौकरी समाप्ति, अनुशासन या पेंशन अधिकारों का सार्वभौमिक फैसला नहीं है।
बैंक की लीगल और क्रेडिट टीम क्या समझें?
बैंकों में टाइटल सर्च, रिकवरी और मुकदमों के लिए बाहरी वकीलों के पैनल होते हैं। ऐसे मामलों में नियुक्ति, रिपोर्ट की समीक्षा और पैनल संबंध समाप्त करने के निर्णय का रिकॉर्ड स्पष्ट रखना जरूरी है। किसी रिपोर्ट से असहमति को बिना ठोस प्रमाण किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप में बदलना ठीक नहीं है।
बैंक की स्वीकृत पैनल नीति, समझौते की शर्तों और उचित पत्राचार का पालन जरूरी है। अगर गिरवी संपत्ति की टाइटल रिपोर्ट में अंतर हो, तो दस्तावेजों और निर्धारित जांच प्रक्रिया के जरिए उसे देखा जाना चाहिए। कोर्ट का यह आदेश सभी भविष्य के विवादों में स्वतः छूट नहीं देता।
आदेश और खबर की तारीख
हाई कोर्ट का आदेश 27 अक्टूबर 2026 का है, जबकि इसकी कानूनी रिपोर्टिंग नवंबर में सामने आई। इसे 7 नवंबर को आया नया फैसला नहीं कहा जा रहा। कोर्ट ने खास सिविल रिवीजन मंजूर करके मानहानि की plaint खारिज की। किसी बाद की अपील या स्थगन की पुष्टि इस समीक्षा में नहीं हुई।
स्रोत और संदर्भ
- Patna High Court judgment via Indian Kanoon — Assistant General Manager, State Bank of India vs Mantosh Prasad Sinha, Civil Revision No. 186 of 2024
- Verdictum — De-Panelment Of Advocate Is Not Defamation; Resulting Financial Loss Is Not Compensable Under Defamation Law: Patna High Court
- Courtbook — Advocate Cannot Sue Client for Defamation Merely for Ending Professional Engagement: Patna High Court
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