दिल्ली हाई कोर्ट ने 9 सितंबर 2026 को Bank of Baroda के रिटायर्ड डिप्टी जनरल मैनेजर की पिछली तारीख से प्रमोशन की मांग खारिज की। कोर्ट ने बैंक की पॉलिसी के आधार पर रिजर्व लिस्ट में स्थान और पद पाने के अधिकार में फर्क बताया।

स्थितिFinal Judgment

दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

दिल्ली हाई कोर्ट ने 9 सितंबर 2026 को Bank of Baroda के रिटायर्ड अधिकारी की पिछली तारीख से प्रमोशन देने की मांग खारिज की। रवि कांत ठकराल 2016 की जनरल मैनेजर प्रमोशन प्रक्रिया की तीन लोगों वाली रिजर्व लिस्ट में पहले नंबर पर थे। उनका कहना था कि लिस्ट समाप्त होने से पहले पद खाली हुए, इसलिए उन्हें 1 दिसंबर 2016 से प्रमोट करना चाहिए था। जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि संबंधित बैंक पॉलिसी सिर्फ पद खाली होने के कारण रिजर्व लिस्ट से प्रमोशन देना अनिवार्य नहीं बनाती।

मामला Ravi Kant Thakral v. Bank of Baroda, W.P.(C) 5601/2019 है। न्यूट्रल साइटेशन 2026:DHC:7779 है। फैसला बैंक की इसी पॉलिसी और केस के तथ्यों पर है। इसे सभी सरकारी या ग्रामीण बैंकों की प्रमोशन पॉलिसी का एक समान नियम नहीं समझना चाहिए।

2016 की प्रमोशन प्रक्रिया में क्या हुआ था?

ठकराल अप्रैल 1978 से बैंक में थे। मई 2014 में डिप्टी जनरल मैनेजर बने और अप्रैल 2018 में रिटायर हुए। 2016 का चयन डिप्टी जनरल मैनेजर (TEG/S-VI) से जनरल मैनेजर (TEG/S-VII) के लिए था। तीन अधिकारी सीधे चुने गए। आगे जरूरत पड़ने पर उपयोग के लिए वेट लिस्ट और अलग रिजर्व लिस्ट भी तैयार हुई। रिजर्व लिस्ट में वे पहले नंबर पर थे लेकिन कुल मेरिट में 20वें स्थान पर थे। इसकी वैधता 1 अप्रैल 2017 तक थी।

उनका दावा था कि दिसंबर 2016 से कुछ पद खाली हुए और उन पर रिजर्व लिस्ट से नियुक्ति होनी चाहिए थी। उन्होंने पुराने सालों में इस लिस्ट के इस्तेमाल और जनरल मैनेजर पदों की प्रस्तावित संख्या 43 से 46 करने का भी हवाला दिया। बैंक ने जवाब दिया कि प्रबंधन को पद खाली रखने का अधिकार है और उस तीन-सदस्यीय रिजर्व लिस्ट से किसी को प्रमोट नहीं किया गया था।

रिजर्व लिस्ट में नाम होने से प्रमोशन पक्का क्यों नहीं?

कोर्ट ने बैंक की प्रमोशन पॉलिसी के क्लॉज 11.8 से 11.10 को साथ पढ़ा। इनमें प्रशासनिक कारणों से पद खाली रखने और वेट लिस्ट से प्रमोशन जारी करने में प्रबंधन के विवेक की व्यवस्था थी। रिजर्व लिस्ट किसी निर्णय के बाद उपयोग होने वाली प्राथमिकता बताती है; हर खाली पद भरने की बाध्यता नहीं बनाती। पूरी लिस्ट का इस्तेमाल ही नहीं हुआ था, इसलिए सिर्फ इस आधार पर दूसरे उम्मीदवारों से अलग भेदभाव साबित नहीं हुआ।

पदों की प्रस्तावित संख्या बढ़ाना भी किसी खास अधिकारी के प्रमोशन का आदेश नहीं था। अदालत ने पिछली तारीख से प्रमोशन और उससे जुड़े लाभ की मांग अस्वीकार की। कुछ शुरुआती कानूनी आपत्तियों पर फैसला देना जरूरी नहीं माना गया।

बैंक स्टाफ और HR के लिए क्या जरूरी है?

  • असल पॉलिसी देखें: रिक्तियों की गणना, रिजर्व लिस्ट की वैधता और प्रबंधन के निर्णय का तरीका हर बैंक और कैडर में अलग हो सकता है।
  • रैंक और नियुक्ति अलग हैं: लिस्ट का उपयोग होने पर पहला स्थान मायने रखता है, लेकिन इससे हर हाल में पद मिलने का अधिकार नहीं बनता।
  • HR रिकॉर्ड जरूरी: मंजूर पद, लिस्ट समाप्त होने की तारीख और पद भरने या खाली रखने के निर्णय दस्तावेज में सुरक्षित रहें।
  • फैसले की सीमा समझें: अगर किसी दूसरे बैंक की पॉलिसी में प्रमोशन अनिवार्य हो या भेदभाव के ठोस सबूत हों, तो कानूनी परिणाम अलग हो सकता है।

तारीख और वर्तमान जानकारी

रिजर्व लिस्ट 2016 की थी और अप्रैल 2017 में समाप्त हुई। अधिकारी 2018 में रिटायर हुए। अदालत ने 9 सितंबर 2026 को फैसला दिया। यह नवंबर में आया नया आदेश नहीं, बल्कि रिसर्च में मिला पुराना महत्वपूर्ण सर्विस-लॉ केस है। देखे गए स्रोतों से बाद की किसी अपील या स्टे की पुष्टि नहीं हुई।

स्रोत और संदर्भ

इस रिपोर्ट के बारे में
स्रोत देखें, लागू होने की स्थिति जांचें और किसी गलती की जानकारी हमें दें।