कर्नाटक हाई कोर्ट ने बैंक ऑफ बड़ौदा के एक अधिकारी का 17 मार्च 2026 का ट्रांसफर और रिलीविंग आदेश 17 अक्टूबर के फैसले में रद्द किया। अदालत ने इस खास मामले में आदेश की मंशा पर सवाल पाया। इसके बाद ऑफिसर्स यूनियन ने आरोप लगाया कि अधिकारी को फिर से ड्यूटी जॉइन करने में रोका गया। कोर्ट का फैसला उपलब्ध है, लेकिन जॉइनिंग से जुड़ा बाद का आरोप अभी यूनियन का पक्ष है।

किसके लिएBank of Baroda officers; petitioner is a senior manager and officers union joint secretaryस्थितिFinal Judgment

हाई कोर्ट ने वास्तव में क्या आदेश दिया?

कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस एस. सुनील दत्त यादव ने रिट याचिका संख्या 11356/2026 में बैंक ऑफ बड़ौदा के एक सीनियर मैनेजर के ट्रांसफर पर सुनवाई की। अधिकारी बेंगलुरु में तैनात थे। 17 मार्च 2026 के आदेश में उन्हें वहां से रिलीव करके आगे की पोस्टिंग के लिए मंगलुरु जोन में रिपोर्ट करने को कहा गया था। मामले में 9 अक्टूबर को सुनवाई पूरी हुई और 17 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया गया।

फैसले का मुख्य नतीजा साफ है: अदालत ने 17 मार्च वाला आदेश रद्द किया और याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की। अंतिम आदेश में सभी बैंक ट्रांसफर पर रोक, छह महीने की सैलरी देने, मुआवजा देने या बाद में बैंक में एंट्री रोकने के आरोप पर कोई अलग फैसला नहीं दिया गया। इसलिए इन बातों को अदालत का आदेश बताना गलत होगा।

ट्रांसफर में अदालत को क्या समस्या दिखी?

अधिकारी और यूनियन की दलील थी कि उन्होंने स्ट्रेस्ड एसेट रिकवरी से जुड़े कुछ अनियमित मामलों की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी थी और इसके बाद उनका ट्रांसफर अनुचित मंशा से किया गया। बैंक ने इस आरोप का विरोध किया। बैंक का पक्ष था कि प्रशासनिक जरूरत के आधार पर कदम उठाया गया और Bank of Baroda Officers’ Service Regulations, 1979 के Regulation 47 के तहत अधिकारियों का ट्रांसफर देश में कहीं भी किया जा सकता है। बैंक ने यह भी कहा कि उसकी पॉलिसी या सरकारी गाइडलाइन इस रेगुलेशन से ऊपर नहीं हैं।

अदालत ने माना कि सामान्य तौर पर ट्रांसफर सर्विस का हिस्सा है और कोर्ट हर ट्रांसफर में दखल नहीं देता। फिर उसने दो दस्तावेजों की टाइमिंग पर ध्यान दिया: 16 मार्च 2026 का शो-कॉज नोटिस, जिसमें गोपनीय बैंक जानकारी कथित रूप से बाहर भेजने का आरोप था, और अगले दिन 17 मार्च का ट्रांसफर आदेश। फैसले के मुताबिक बैंक यह पर्याप्त रूप से नहीं समझा सका कि दोनों घटनाओं के बीच कोई अनुचित संबंध नहीं था। खास परिस्थितियों में अदालत ने ट्रांसफर के पीछे गलत मंशा पाई और आदेश रद्द किया। शो-कॉज नोटिस में लगा आरोप अपने-आप में साबित हुआ कदाचार नहीं है।

तारीख दस्तावेज या घटनाक्रम
16 मार्च 2026 बैंक ने गोपनीय सूचना के कथित गलत इस्तेमाल पर शो-कॉज नोटिस भेजा।
17 मार्च 2026 विवादित ट्रांसफर और रिलीविंग आदेश जारी हुआ।
17 अक्टूबर 2026 हाई कोर्ट ने संबंधित आदेश रद्द कर याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की।
29 अक्टूबर 2026 रिपोर्ट के अनुसार यूनियन ने जॉइनिंग में बाधा और अन्य मुद्दों पर नई शिकायत उठाई।

बाद में जॉइनिंग को लेकर यूनियन ने क्या कहा?

31 अक्टूबर को प्रकाशित Kanal की रिपोर्ट के अनुसार All India Bank of Baroda Officers’ Union (AIBOBOU) ने दावा किया कि अधिकारी 22 अक्टूबर को फिर से ड्यूटी जॉइन करने पहुंचे, लेकिन उन्हें जॉइन नहीं करने दिया गया। यूनियन का यह भी आरोप है कि 29 अक्टूबर को निजी सुरक्षा कर्मियों ने उनके कार्यालय में प्रवेश में बाधा डाली। यूनियन ने बकाया सैलरी, मेडिकल लीव और HR सिस्टम तक पहुंच जैसे मामले भी उठाए।

ये यूनियन के आरोप और मांगें हैं, कोर्ट के फैसले में साबित हुई घटनाएं नहीं। उपलब्ध रिपोर्ट और कोर्ट रिकॉर्ड में इन बाद की शिकायतों पर कोई नया न्यायिक निष्कर्ष, बैंक का सत्यापित जवाब या अपील में स्टे का प्रमाण नहीं मिला। इससे अपने-आप किसी पक्ष की पूरी बात सही या गलत साबित नहीं होती।

दूसरे बैंक अधिकारियों के लिए क्या सीख है?

इस केस में दो बातें साथ-साथ महत्वपूर्ण हैं। बैंक के पास नियमों के तहत ट्रांसफर करने की शक्ति होती है। लेकिन यदि खास रिकॉर्ड से यह दिखे कि उस शक्ति का इस्तेमाल उचित प्रशासनिक जरूरत के बजाय किसी दूसरी मंशा से हुआ, तो कोर्ट उस आदेश की जांच कर सकता है। यह फैसला इस अधिकारी और इस आदेश के तथ्यों पर आधारित है। इसका मतलब नहीं कि हर मिड-ईयर ट्रांसफर या हर बैंक में ऐसा ट्रांसफर अपने-आप रद्द हो जाएगा।

ट्रांसफर विवाद में अधिकारी को लागू सर्विस रेगुलेशन, बैंक पॉलिसी, नोटिस, ईमेल और कोर्ट के अंतिम निर्देश को अलग-अलग समझना चाहिए। किसी दूसरे मामले पर राहत स्वतः लागू मान लेना सही नहीं होगा।

अभी किन बातों की पुष्टि नहीं हुई?

अधिकारी को बाद में जॉइनिंग मिली या नहीं, सैलरी या लीव विवाद सुलझा या नहीं, और किसी अपील या नए आदेश की स्थिति क्या है—इनका स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध स्रोतों से नहीं मिला। इन अनिश्चित बातों को अंतिम निर्णय या कोर्ट की अवमानना का स्थापित मामला बताकर पेश नहीं किया जा रहा है।

स्रोत और संदर्भ

  1. High Court of Karnataka judgment reproduced by Indian Kanoon: All India Bank Of Baroda Officers' Union vs Union Of India on 17 October, 2026 (WP No. 11356 of 2026)
  2. Kanal: Employee Blocked from Entering Bank by Management's Private Guards: AIBOBOU Accuses BOB of Defying HC Order
इस रिपोर्ट के बारे में
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