लखनऊ की विशेष CBI अदालत ने बैंक ऑफ बड़ौदा के एक पूर्व शाखा प्रबंधक को 2015 के रिश्वत मामले में 2 नवंबर 2026 को चार साल की कैद और ₹30,000 जुर्माने की सजा सुनाई। कई समाचार संस्थानों ने CBI के बयान के आधार पर फैसला रिपोर्ट किया है। अदालत के हस्ताक्षरित मूल आदेश की स्वतंत्र जांच नहीं हो सकी।
लखनऊ की अदालत ने क्या फैसला सुनाया?
Hindustan Times, Business Today और The Times of India की रिपोर्टों के अनुसार लखनऊ की विशेष CBI अदालत ने बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व शाखा प्रबंधक सुबोध कुमार रस्तोगी को रिश्वत के मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने 2 नवंबर 2026 को चार साल की कैद और ₹30,000 जुर्माने की सजा सुनाई। जब यह मामला शुरू हुआ था, तब रस्तोगी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में बैंक की शाखा के मैनेजर थे।
यह सिर्फ FIR या गिरफ्तारी की खबर नहीं है, बल्कि सुनवाई के बाद अदालत द्वारा सजा दिए जाने की रिपोर्ट है। हालांकि इस लेख के लिए मूल हस्ताक्षरित कोर्ट ऑर्डर स्वतंत्र रूप से नहीं देखा जा सका। अपील हुई है या सजा पर कोई आगे का आदेश आया है, इसकी भी पुष्टि नहीं है। इसलिए इसे हर तरह की कानूनी चुनौती से परे अंतिम स्थिति बताना ठीक नहीं होगा।
2015 में मामला कैसे शुरू हुआ था?
CBI ने 26 अक्टूबर 2015 को एक कारोबारी की शिकायत पर केस दर्ज किया था। शिकायत सोलर लाइट के कारोबार को बढ़ाने के लिए दिए गए ₹5 लाख के लोन से जुड़ी थी। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें ₹1.25 लाख का टर्म लोन और ₹3.75 लाख की कैश क्रेडिट सुविधा शामिल थी।
शिकायत में पहले लगभग ₹25,000 अलग-अलग चार्ज के नाम पर लेने और फिर ₹25,000 और रिश्वत मांगने का आरोप था। प्रकाशित CBI विवरण के अनुसार जांच एजेंसी ने ट्रैप की कार्रवाई की और तत्कालीन मैनेजर को ₹10,000 लेते पकड़ा। इसके बाद 18 दिसंबर 2015 को चार्जशीट दाखिल की गई। अदालत ने मुकदमा चलने के बाद सजा सुनाई।
मामले की टाइमलाइन
- 26 अक्टूबर 2015: कारोबारी की शिकायत पर CBI केस दर्ज हुआ।
- 18 दिसंबर 2015: जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई।
- 2 नवंबर 2026: विशेष अदालत ने दोषसिद्धि और सजा का फैसला सुनाया।
- 3–4 नवंबर 2026: समाचार संस्थानों ने CBI बयान के आधार पर फैसले का विवरण प्रकाशित किया।
बैंकर्स के लिए फैसले का दायरा
अदालत का यह फैसला एक पूर्व शाखा प्रबंधक और उस खास मामले से संबंधित है। इससे बैंक ऑफ बड़ौदा के किसी दूसरे अधिकारी की संलिप्तता साबित नहीं होती और न ही लोन मंजूरी के सभी मामलों के लिए कोई नया सामान्य नियम बन जाता है। 2015 की शिकायत के आरोपों को बाद की दोषसिद्धि के संदर्भ में समझना चाहिए, उन्हें दूसरे लोगों पर लागू नहीं करना चाहिए।
देखी गई रिपोर्टों में पूरे निर्णय की कानूनी दलीलें, आदेश का हस्ताक्षरित पाठ और अपील की मौजूदा स्थिति नहीं मिली। आगे की रिपोर्टिंग में इन तथ्यों को अलग से जांचना जरूरी होगा। बैंकिंग के नजरिए से जरूरी बात यह है कि अधिकृत लोन शुल्क का रिकॉर्ड स्पष्ट रहे और व्यक्तिगत भुगतान को बैंक शुल्क से कभी नहीं मिलाया जाए। यह दूसरे कर्मचारियों पर आरोप नहीं है।
स्रोत और संदर्भ
- Hindustan Times: Ex-bank manager gets 4-yr jail in bribery case in UP’s Balrampur (2026-11-03)
- Business Today: Caught taking ₹10,000 bribe: Former Bank of Baroda branch manager gets 4-year jail term (2026-11-03)
- The Times of India: Ex-bank manager gets 4 years jail in bribery case (2026-11-04)
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