मथुरा के UCO Bank से जुड़े कथित रिश्वत मामले में 5 नवंबर 2026 को गाजियाबाद की विशेष CBI अदालत में अभियोजन पक्ष के गवाह का बयान दर्ज हुआ। मुकदमे में आरोप तय हो चुके हैं, लेकिन अदालत ने आरोपियों को दोषी करार नहीं दिया है।

गाजियाबाद की अदालत में क्या हुआ?

मथुरा के UCO Bank से जुड़े कथित रिश्वत मामले में गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को गाजियाबाद की विशेष केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अदालत में अभियोजन पक्ष की गवाही हुई। अमर उजाला की स्थानीय कोर्ट रिपोर्ट के अनुसार, बैंक मुख्यालय के अधिकारी राजेश नागर अदालत में पेश हुए और बयान दर्ज कराया। उन्होंने मामले में अभियोजन चलाने की स्वीकृति दी थी। रिपोर्ट में पीठासीन न्यायिक अधिकारी का नाम भारत सिंह यादव बताया गया है। गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया अभी चल रही है। अगली सुनवाई की पक्की तारीख उपलब्ध रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं होती।

मामला किस आरोप से जुड़ा है?

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, मथुरा की एक आटा मिल फर्म के लिए ₹1 करोड़ की कैश क्रेडिट लिमिट मंजूर हुई थी। अखबार की रिपोर्ट कहती है कि ₹90 लाख खाते में भेजे गए, जबकि बाकी ₹10 लाख जारी नहीं किए गए थे। आरोप है कि यह रकम जारी करने के बदले बैंक की तत्कालीन सीनियर मैनेजर गरिमा सिंह ने ₹4 लाख रिश्वत मांगी थी।

अमर उजाला के अनुसार, शिकायत के बाद CBI ने सितंबर 2025 में ट्रैप कार्रवाई की। एजेंसी का आरोप था कि ₹2 लाख की पहली किस्त उस समय की मैनेजर और उनके निजी सहयोगी आरिफ मोहम्मद ने ली। इस कार्रवाई में दोनों को गिरफ्तार किए जाने की खबर दी गई थी। ये जांच एजेंसी के आरोप हैं; इन्हें अदालत में सिद्ध हो चुकी बात नहीं माना जा सकता।

पहले की सुनवाई से अब क्या बदला?

12 अक्टूबर 2026 की अमर उजाला रिपोर्ट में आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया को लेकर अदालत में बहस का उल्लेख था। 5 नवंबर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अब दोनों के खिलाफ आरोप तय हो चुके हैं और अभियोजन के गवाहों के बयान दर्ज हो रहे हैं। मुकदमा चलाने की स्वीकृति से जुड़े बैंक अधिकारी की गवाही इस केस की नई न्यायिक कार्रवाई है। यह कोई नया गिरफ्तारी आदेश या अंतिम फैसला नहीं है।

मुकदमे की मौजूदा स्थिति

आरोप तय होने का अर्थ यह है कि मामले का ट्रायल आगे बढ़ेगा। इससे आरोपियों का दोष सिद्ध नहीं होता। अदालत का हस्ताक्षरित आदेश और गवाह की मूल बयान प्रति इस खबर के लिए स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं थी। अखबार की रिपोर्ट से न तो सजा होने की पुष्टि होती है और न ही किसी बैंक-व्यापी विभागीय कार्रवाई की। अंतिम निर्णय तक आरोपियों को निर्दोष माने जाने का कानूनी सिद्धांत लागू रहता है।

यह मामला एक खास कैश क्रेडिट खाते से जुड़े कथित आचरण का है। इससे UCO Bank की दूसरी शाखाओं या सभी लोन मामलों के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। आगे कोई महत्वपूर्ण आदेश आए तो उसकी पुष्टि अदालत के रिकॉर्ड और विश्वसनीय रिपोर्टिंग से की जानी चाहिए।

स्रोत और संदर्भ

इस रिपोर्ट के बारे में
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